जंग-ए-आजादी के नायक को प्रणाम

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दिव्य विश्वास, संवाददाता

मेरठ: अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, मेरठ के द्वारा नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर एवं हवन कर 125वाँ जन्म दिवस मनाया गया। इस अवसर पर अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, उ.प्र. पश्चिम के प्रान्तीय अध्यक्ष ए.के. जौहरी ने बताया कि नेता जी का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। उनके पिता का नाम राय बहादुर जानकी नाथ था तथा माता का नाम प्रभावती था। अपने बाल्य जीवन यानी बचपन में भी वो अंग्रेज बच्चों के साथ खेलना भी पसन्द नहीं करते थे। विश्वविद्यालय प्रांगण से निकलकर 1921 में सक्रिय रुप से स्वतंत्रता संग्राम में कूद गये थे। सितम्बर 1939 से आजादी की लड़ाई तेज हो गयी। सुभाष जी दीन दलितों की सेवा करने वाली संस्था डॉ. सुरेन्द्र नाथ बनर्जी की संस्था में शामिल हुये। उन्होने राम कृष्ण मिशन के वार्षिक उत्सव कार्यक्रम में स्वामी विवेकानन्द जी का भी भाषण सुना तथा प्रभावित हुये। पिता के आदेशों के अनुरुप उन्होने केमब्रिज विश्वविद्यालय से आई.सी.एस. किया, वह विश्वविद्यालय में चतुर्थ स्थान पर रहे परन्तु उन्होने उससे मिलने वाले पद का त्याग कर दिया। वक्त के चलते सुभाष जी का सम्पर्क कलकत्ता हाई कोर्ट के सर्वश्रेष्ठ वैरिस्टर देशबन्धु चितरन्जन दास जी से हुआ, जिन्होने अपनी तिजौरी का मुँह खोल दिया। जो दशा राम कृष्ण परमहंस से मिलकर विवेकानन्द जी की हुई थी वही दशा सुभाष की चितरन्जन दास जी से मिलकर हुई और सुभाष चितरन्जन दास के नेतृत्व में भारती स्वतन्त्रता संग्राम की समर भूमि में उतर पड़े।
आजाद हिन्द फौज का सेनापति पद गृहण करते हुए 25.08.1943 को उन्होने अपनी फौज को देश के प्रति संदेश दिया। सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज का बड़ा आयोजन किया गया। इसी स्थान पर हिन्दू-मुसलमान और सिखों ने कन्धे से कन्धा मिलाकर आजादी की कसम खाई थी। यही वह स्थान है जहाँ आजादी पाने के लिए रोजाना प्राण न्यौछावर किये गये। आजाद हिन्द फौज ने वर्मा की रक्षा के लिये प्राणपण से जुटी रही।
नेता जी स्वयं पहुँचे। नेता जी बैंकॉक से जापान के सम्राट हिरोहितो से मिलने के लिये गये थे। फारसोमा के निकट ताईहोक में उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। जिसकी घोषणा जापान रेडियो द्वारा 25.08.1945 को हुई। नेता जी की अकस्मात मृत्यु से आजादी के युद्ध को गहरा झटका तो लगा परन्तु भारतीय आजादी की आग ठन्डी न पड़ी,सुलगती गई।
नेता जी ने जो चिंगारी छोड़ी थी उसकी लपटें उठने लगी, समय भागता गया। अन्ततः 1947 में भारत विभाजन के साथ देश में आजादी आ गयी। हिटलर ने पहली बार सुभाष चन्द बोस को नेता जी कहकर पुकारा था। उनका अंतिम समय कैसा भी क्यों न रहा हो, वह भारत के महान सपूत थे और देश युग-युग तक उनको नमन करता रहेगा।

इस अवसर पर कायस्थ सभा, मेरठ के अध्यक्ष मदन मोहन जौहरी ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए उनके पराक्रम से राष्ट्र हेतु प्रेरणा लेने का संदेश दिया।

इस अवसर पर प्रमुख रुप से श्री आलोक भटनागर, के.बी. सक्सैना, ज्ञानेन्द्र सक्सैना, गोपाल नारायण, विनोद, दिनेश, मनोज, जिला अध्यक्ष शचिन्द्र मोहन भटनागर, सुरेश जौहरी, मन मोहन, मदन मोहन जौहरी, मुकेश कुमार सक्सैना, ए.के. सक्सैना, अजय भटनागर, रेखा जौहरी, आर.के. सक्सैना एवं हिमान्शु भटनागर प्रमखु रुप से उपस्थित रहे।

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